Thursday, March 7, 2013

चार पल











चार पल

कभी गर्दिशों  से दोस्ती कभी गम से याराना हुआ
चार पल की जिन्दगी का ऐसे  कट जाना हुआ..

इस आस में बीती उम्र कोई हमे अपना कहे .
अब आज के इस दौर में ये दिल भी बेगाना हुआ

जिस रोज से देखा उन्हें मिलने लगी मेरी नजर
आखो से मय  पीने लगे मानो की मयखाना हुआ

इस कदर  अन्जान हैं  हम आज अपने हाल से
हमसे मिलकरके बोला आइना ये शख्श बेगाना हुआ

ढल नहीं जाते हैं  लब्ज यूँ ही रचना में कभी
कभी ग़ज़ल उनसे मिल गयी कभी गीत का पाना हुआ


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना  

Friday, March 1, 2013

मुक्तक (अपना हाल)

 
 
अपना हाल

अपना हाल ऐसा है की हम जाने और दिल जाने
पल भर भी बो ओझल हो तो देता दिल हमें ताने
रह करके सदा   उनका  हमें जीना  हमें मरना 
गुजारिश  है खुदा  से  अब ,  हमको  न  जुदा  करना 

प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, February 20, 2013

बिबश्ता

















बिबश्ता

आँखों  में  जो सपने थे, सपनों में जो सूरत थी
नजरें जब मिली उनसे बिलकुल बैसी  मूरत थी

जब भी गम मिला मुझको या अंदेशे कुछ पाए हैं
बाजू में बिठा कर के ,उन्होंने अंदेशे मिटाए हैं

उनका साथ पाकर के तो दिल ने ये ही  पाया है
अमाबस की अँधेरी में ज्यों चाँद निकल पाया है

जब से मैं मिला उनसे , दिल को यूँ खिलाया है
अरमां जो भी मेरे थे हकीकत में  मिलाया है

बातें करनें जब उनसे  हम उनके पास हैं जाते
चेहरे  पे जो रौनक है उनमें हम फिर खो जाते

ये मजबूरी जो अपनी है हम  उनसे बच नहीं पाते
जब देखे रूप उनका तो हम बाते कर नहीं पाते 

बिबश्ता देखकर मेरी सब कुछ बह समझ  जाते 
आँखों से ही करते हैं बे अपने दिल की सब बातें




काब्य प्रस्तुति :   
मदन मोहन सक्सेना



Thursday, February 14, 2013

वसंत पंचमी



आप सब को वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाए.माँ शारदे की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे.


मदन मोहन सक्सेना .


Wednesday, February 13, 2013

मुहब्बत(प्यार ,प्रेम स्नेह ,प्रीत ,लगाब )

 
 
 
  
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
वैलेनटाइन दिन पर मुहब्बत (प्यार ,प्रेम स्नेह ,प्रीत ,लगाब )जो भी नाम दे दें ,को समर्पित एक कबिता आप सब के लिए प्रस्तुत है।

प्यार रामा में है प्यारा अल्लाह लगे ,प्यार के सूर तुलसी ने किस्से लिखे
प्यार बिन जीना दुनिया में बेकार है ,प्यार बिन सूना सारा ये संसार है

प्यार पाने को दुनिया में तरसे सभी, प्यार पाकर के हर्षित हुए हैं  सभी
प्यार से मिट गए सारे शिकबे गले ,प्यारी बातों पर हमको ऐतबार है

प्यार के गीत जब गुनगुनाओगे तुम ,उस पल खार से प्यार पाओगे तुम
प्यार दौलत से मिलता नहीं है कभी ,प्यार पर हर किसी का अधिकार है

प्यार से अपना जीवन सभारों जरा ,प्यार से रहकर हर पल गुजारो जरा
प्यार से मंजिल पाना है मुश्किल नहीं , इन बातों से बिलकुल न इंकार है

प्यार के किस्से हमको निराले लगे ,बोलने के समय मुहँ में ताले लगे
हाल दिल का बताने जब हम मिले ,उस समय को हुयें हम लाचार हैं

प्यार से प्यारे मेरे जो दिलदार है ,जिनके दम से हँसीं मेरा संसार है
उनकी नजरो से नजरें जब जब मिलीं,उस पल को हुए उनके दीदार हैं

प्यार जीवन में खुशियाँ लुटाता रहा ,भेद आपस के हर पल मिटाता रहा
प्यार जीवन की सुन्दर कहानी सी है ,उस कहानी का मदन एक किरदार है

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Monday, February 11, 2013

मुक्तक (आदत)






















मयखाने की चौखट को कभी मदिर न समझना तुम
मयखाने जाकर पीने की मेरी आदत नहीं थी
चाहत से जो देखा मेरी ओर उन्होंने
आँखों में कुछ छलकी मैंने थोड़ी पी थी



प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Thursday, February 7, 2013

जगजीत सिंह के जन्मदिन पर उनको शत शत नमन




जगजीत सिंह के जन्मदिन पर उनको शत शत नमन


ग़ज़ल सम्राट  जगजीत सिंह के जन्मदिन पर उनको शत शत नमन .इस अबसर पर पेश है  आज एक अपनी पुरानी ग़ज़ल जिसे देख कर  खुद जगजीत सिंह जी ने संतोष ब्यक्त किया था . ये मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

कल  तलक लगता था हमको शहर ये जाना हुआ
इक  शख्श अब दीखता नहीं तो शहर ये बीरान है

बीती उम्र कुछ इस तरह कि खुद से हम न मिल सके
जिंदगी का ये सफ़र क्यों इस कदर अंजान है

गर कहोगें दिन  को दिन तो लोग जानेगें गुनाह 
अब आज के इस दौर में दिखते  नहीं इन्सान है

इक दर्द का एहसास हमको हर समय मिलता रहा
ये बक्त  की साजिश है या फिर बक्त  का एहसान है

गैर बनकर पेश आते, बक्त पर अपने ही लोग
अपनो की पहचान करना अब नहीं आसान है 

प्यासा पथिक और पास में बहता समुन्द्र देखकर 
जिंदगी क्या है मदन , कुछ कुछ हुयी पहचान है 

 


ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

Tuesday, February 5, 2013

दोष


 











दोष



ये दोष मेरे भाग्य का या वक़्त की साजिश कहें
हम प्यार जिनसे कर रहे बे दूर हमसे रह रहे

देखा तो होती  है सुबह , ना   पा सके  तो रात है
कल तलक जो बश में था ना आज अपने हाथ  है

जिस दिल पर अखित्यार  था बह आज बेगाना हुआ
जिस पल को नजरें मिल गयी बस गीत बन जाना हुआ

आँखों में सूरत बस गयी लबों पर उनका नाम है
उनकी बंदगी करते रहे बस   ये  ही   अपना  काम है  

हर  गीत   मेरे प्यार की खामोश सी आबाज है
ना जाने कब बो जानेंगें मेरे दिल का जो भी राज है

होगी सुबह अगले ही पल कुछ पल की केबल शाम है
प्यार केवल कर मदन , लगनें दे जो इल्जाम हैं


काब्य प्रस्तुति :   
मदन मोहन सक्सेना

Monday, February 4, 2013

नज़राना















नज़राना



अपना दिल कभी था जो, हुआ है आज बेगाना
आकर के यूँ चुपके से, मेरे दिल में जगह पाना
दुनियां में तो अक्सर ही ,संभल कर लोग गिर जाते
मगर उनकी ये आदत है की गिरकर भी सभल जाना

आकर पास मेरे फिर धीरे से यूँ मुस्काना
पाकर पास मुझको फिर धीरे धीरे शरमाना
देखा तो मिली नजरें फिर नजरो का झुका जाना
ये उनकी ही अदाए हैं  मुश्किल है कहीं पाना

जो बाते रहती दिल में है ,जुबां पर भी नहीं लाना
बो लम्बी झुल्फ रेशम सी और नागिन सा लहर खाना
बो नीली झील सी आँखों में दुनियां का नजर आना
बताओ तुम कि  दे दूँ क्या ,अपनी नजरो को मैं नज़राना ......




प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना



Thursday, January 31, 2013

प्रीत





 









प्रीत



नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं 
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई 

प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे 
फिर मिलन की ऋतू  आयी भागी तन्हाई 

दिल से फिर दिल का करार होने लगा 
खुद ही फिर खुद से क्यों प्यार होने लगा 

नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं 
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई 


प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना 

Thursday, January 24, 2013

मेरा भारत महान




मेरा भारत महान
जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान

गंगा यमुना सी नदियाँ हैं जो देश का मन बढ़ाती हैं
सीता सावित्री सी देवी जो आज भी पूजी जाती हैं

यहाँ जाति धर्म का भेद नहीं सब मिलजुल करके रहतें हैं
गाँधी सुभाष टैगोर तिलक नेहरु का भारत कहतें हैं

यहाँ नाम का कोई जिक्र नहीं बस काम ही देखा जाता है
जिसने जब कोई काम किया बह ही सम्मान पाता है

जब भी कोई मिले आकर बो गले लगायें जातें हैं
जन आन मान की बात बने तो शीश कटाए जातें हैं

आजाद भगत बिस्मिल रोशन बीरों की ये तो जननी है
प्रण पला जिसका इन सबने बह पूरी हमको करनी है

मथुरा हो या काशी हो चाहें अजमेर हो या अमृतसर
सब जातें प्रेम भाब से हैं झुक जातें हैं सबके ही सर.
  



प्रस्तुति: 
मदन मोहन सक्सेना

Tuesday, January 22, 2013

मुक्तक (जान)

















ये जान जान कर जान गया ,ये जान तो मेरी जान नहीं
जिस जान के खातिर  जान है ये, इसमें उस जैसी शान नहीं

जब जान बो मेरी चलती   है ,रुक जाते हैं चलने बाले
जिस जगह पर उनकी नजर पड़े ,थम जाते हैं  मय के प्याले 


मुक्तक प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

Thursday, January 17, 2013

बोल




उसे हम बोल क्या बोलें जो दिल को दर्द दे जाये
सुकूं दे चैन दे दिल को , उसी को बोल बोलेंगें ..

जीवन के सफ़र में जो मुसीबत में भी अपना हो
राज ए दिल मोहब्बत के, उसी से यार खोलेंगें  ..

जब अपनों से और गैरों से मिलते हाथ सबसे हों
किया जिसने भी जैसा है , उसी से यार तोलेंगें ..

अपना क्या, हम तो बस, पानी की ही माफिक हैं
 मिलेगा प्यार से हमसे ,उसी  के यार होलेंगें ..

जितना हो जरुरी ऱब, मुझे उतनी रोशनी देना 
अँधेरे में भी डोलेंगें उजालें में भी डोलेंगें ..
 



मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, January 9, 2013

झमेले





अपनी जिंदगी गुजारी है ख्बाबों के ही सायें में
ख्बाबों  में तो अरमानों के जाने कितने मेले हैं  

भुला पायेंगें कैसे हम ,जिनके प्यार के खातिर
सूरज चाँद की माफिक हम दुनिया में अकेले हैं  

महकता है जहाँ सारा मुहब्बत की बदौलत ही
मुहब्बत को निभाने में फिर क्यों सारे झमेले हैं  

ये उसकी बदनसीबी गर ,नहीं तो और फिर क्या है
जिसने पाया है बहुत थोड़ा ज्यादा गम ही झेले हैं 

प्रस्तुति:

मदन मोहन सक्सेना

Thursday, January 3, 2013

सच्चा प्यार





बोलेंगे  जो  भी  हमसे  बो ,हम ऐतवार कर  लेगें
जो कुछ  भी उनको प्यारा  है ,हम उनसे प्यार कर  लेगें

बो  मेरे   पास  आयेंगे   ये  सुनकर  के   ही  सपनो  में
क़यामत  से क़यामत तक हम इंतजार कर लेगें

मेरे जो भी सपने है और सपनों में जो सूरत है
उसे दिल में हम सज़ा करके नजरें चार कर लेगें

जीवन भर की सब खुशियाँ ,उनके बिन अधूरी है
अर्पण आज उनको हम जीबन हजार कर देगें

हमको प्यार है उनसे और करते प्यार बो हमको
गर  अपना प्यार सच्चा है तो मंजिल पर कर लेगें



मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, January 2, 2013

ग़ज़ल




सजा  क्या खूब मिलती है ,  किसी   से   दिल  लगाने  की
तन्हाई  की  महफ़िल  में  आदत  हो  गयी   गाने  की 

हर  पल  याद  रहती  है , निगाहों  में  बसी  सूरत
तमन्ना  अपनी  रहती  है  खुद  को  भूल  जाने  की 

 उम्मीदों   का  काजल    जब  से  आँखों  में  लगाया  है
कोशिश    पूरी  रहती  है , पत्थर  से  प्यार  पाने  की 

अरमानो  के  मेले  में  जब  ख्बाबो  के  महल   टूटे
बारी  तब  फिर  आती  है , अपनों  को  आजमाने  की

मर्जे  इश्क  में   अक्सर हुआ करता है ऐसा भी
जीने पर हुआ करती है ख्बहिश मौत पाने की



ग़ज़ल
मदन मोहन सक्सेना